और अगर यह सब काफी नहीं था, तो एक और साइलेंट किलर है—डेप्रिसिएशन और कैपेक्स (Capital E

और अगर यह सब काफी नहीं था, तो एक और साइलेंट किलर है—डेप्रिसिएशन और कैपेक्स (Capital Expenditure)। एक फाइव-स्टार होटल को हमेशा नया और चमकदार दिखना होता है। सात से आठ साल के भीतर, कालीन पुराने लगने लगते हैं, बाथरूम का मार्बल अपनी चमक खोने लगता है, और डिज़ाइन आउटडेटेड हो जाता है। होटल को अपना स्टेटस बनाए रखने के लिए हर 7 से 10 साल में करोड़ों रुपये खर्च करके पूरा रेनोवेशन करना पड़ता है। यह कोई चॉइस नहीं है, यह एक मजबूरी है। यह लगातार होने वाला खर्च उस बचे-खुचे फ्री कैश फ्लो को भी सोख लेता है। यहीं पर हम इस बिजनेस के सबसे बड़े जोखिम को समझते हैं—'प्रॉफिट सेंसिटिविटी'। फाइव-स्टार होटल एक 'ऑपरेटिंग लीवरेज' बिजनेस है। इसका सीधा सा मतलब है कि इसके फिक्स्ड कॉस्ट इतने ज्यादा हैं कि रेवेन्यू में एक छोटा सा बदलाव मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर सकता है। अगर आर्थिक मंदी के कारण ऑक्यूपेंसी 70% से गिरकर 60% हो जाए, तो खर्च कम नहीं होंगे। एसी वैसे ही चलेंगे, लॉबी की लाइट्स जलेंगी, और स्टाफ को पूरी सैलरी देनी ही पड़ेगी। वह 10% की गिरावट सीधे राहुल के नेट प्रॉफिट को जीरो कर सकती है। कोई भी बाहरी झटका—जैसे फ्लाइट्स का कैंसिल होना, आर्थिक मंदी या पास में ही एक नए कॉम्पिटिटर का खुल जाना—इस नाजुक वित्तीय संतुलन को मिनटों में बिगाड़ सकता है।
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