अस्पतालों को यह डिस्काउंट देना पड़ता है

अस्पतालों को यह डिस्काउंट देना पड़ता है। क्यों? क्योंकि उन्हें अपना ऑक्यूपेंसी रेट (occupancy rate) 70-80 प्रतिशत के ऊपर रखना है। खाली बेड किसी भी अस्पताल के लिए सबसे बड़ा नुकसान है। अगर एक बेड आज रात खाली है, तो उसका रेवेन्यू हमेशा के लिए खत्म हो गया। आप उसे कल रिकवर नहीं कर सकते। इसलिए अस्पताल मार्जिन का नुकसान सहकर भी इंश्योरेंस के जरिए वॉल्यूम लाना पसंद करते हैं। यह व्यवसाय इतनी पूंजी मांगता है कि आज अस्पताल खुद जमीन खरीदना पसंद नहीं करते। वे 'एसेट लाइट मॉडल' अपना रहे हैं। वे रियल एस्टेट कंपनियों के साथ साझेदारी करते हैं। बिल्डर जमीन खरीदकर अस्पताल की इमारत बनाता है, और अस्पताल चलाने वाली कंपनी सिर्फ अपने ब्रांड, मशीनें और डॉक्टर लाती है। इसके बदले में अस्पताल रेवेन्यू का एक हिस्सा बिल्डर को देता है। इससे अस्पताल को शुरुआत में सैकड़ों करोड़ रुपये जमीन पर खर्च नहीं करने पड़ते और उनका कैश फ्लो बेहतर हो जाता है। तो अब जब हम इन सारे टुकड़ों को एक साथ जोड़ते हैं, तो पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। प्रीमियम कॉर्पोरेट अस्पताल कोई चैरिटी या केवल स्वास्थ्य सेवा देने वाली संस्थाएं नहीं हैं। वे एक ऐसा हाइब्रिड बिजनेस मॉडल हैं जिन्हें जिंदा रहने के लिए रियल एस्टेट की तरह ऑक्यूपेंसी, रिटेल की तरह फार्मेसी मार्जिन,
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