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और यह सब शुरू होने से पहले एक और छिपी हुई चुनौती होती है—रेगुलेशंस और लाल फीताशाही। भारत में एक फाइव-स्टार होटल खोलने और चलाने के लिए 70 से 100 अलग-अलग लाइसेंस और मंजूरियों की जरूरत होती है। फायर सेफ्टी, फूड सेफ्टी, पॉल्यूशन कंट्रोल, म्यूजिक लाइसेंस, और सबसे मुश्किल—लिकर (शराब) लाइसेंस। इन मंजूरियों को लेने में सालों लग जाते हैं। और याद रखिए, बिजनेस में समय का मतलब पैसा होता है। जिस इमारत को बनने में 4 साल लगने थे, अगर सरकारी मंजूरियों के कारण वह 6 साल में बनती है, तो उन 2 सालों तक ओनर को बैंक का करोड़ों रुपये का भारी ब्याज देना पड़ता है, वह भी बिना एक रुपया कमाए। कई होटल मालिक तो दरवाजे खुलने से पहले ही बैंकरप्ट हो जाते हैं। चलिए इस पूरी अर्थशास्त्र को एक यथार्थवादी सिमुलेशन से समझते हैं। मान लीजिए, राहुल नाम का एक डेवलपर 200 कमरों का एक शानदार होटल बनाता है। बहुत अच्छा दिन है और 70% ऑक्यूपेंसी है। 140 कमरे ₹10,000 प्रति रात के हिसाब से बिकते हैं। कमरों से एक दिन का रेवेन्यू हुआ ₹14,00,000। इसमें रेस्टोरेंट, बार और इवेंट्स का ₹10,00,000 और जोड़ लें। कुल रेवेन्यू हुआ ₹24 लाख प्रतिदिन। महीने का लगभग ₹7.2 करोड़।
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