जगन्नाथ पुरी... जहाँ भगवान सिर्फ पत्थर की मूर्ति नहीं, बल्कि साक्षात जीवंत देवता हैं। यहाँ की हवाओं में भक्ति है और कण-कण में जगन्नाथ। आज हम आपको सुनाएंगे एक ऐसे भक्त की कहानी, जिसने भगवान को मंदिर के गर्भगृह से बाहर आने पर मजबूर कर दिया। यह कहानी है परम भक्त माधव दास की। माधव दास जी भगवान के ऐसे प्रेमी थे, जिनका इस दुनिया में भगवान के सिवा कोई न था। वे घंटों समुद्र किनारे बैठकर प्रभु के नाम का जाप करते थे। उनके लिए जगन्नाथ ही पिता थे, जगन्नाथ ही सखा। लेकिन एक दिन, नियति ने करवट ली। माधव दास को 'अतिसार' (Diarrhea) का भयंकर रोग हो गया। शरीर इतना कमजोर हो गया कि वे उठने-बैठने के लायक भी न रहे। उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं था। वे अपनी ही गंदगी में पड़े रहते थे। असहनीय पीड़ा में उन्होंने पुकारा— "हे जगन्नाथ! क्या आप अपने बालक को इस हाल में छोड़ देंगे?" और तभी... एक चमत्कार हुआ। एक छोटा सा बालक माधव दास की कुटिया में आया। उस बालक की आँखों में ऐसी चमक थी जो पूरे अंधेरे को मिटा दे। उस बालक ने बिना घृणा के माधव दास की सेवा शुरू की। वह उनके गंदे कपड़े धोता, उनके शरीर को साफ करता और उन्हें दवा खिलाता। कई दिनों बाद जब माधव दास ठीक हुए, तो उन्होंने उस बालक का हाथ पकड़ लिया और पूछा— "मेरे लाल! तुम कौन हो? तुमने मेरी इतनी सेवा की कि कोई सगा बेटा भी नहीं करता। पर मुझे बताओ, तुम हो कौन?" बालक मुस्कुराया और अपने असली रूप में आ गया। सामने साक्षात चक्रपाणि भगवान जगन्नाथ खड़े थे। माधव दास के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। "प्रभु! आप तो त्रिभुवन के स्वामी हैं। आपने मेरे गंदे वस्त्र धोए? आपने मेरे शरीर की गंदगी साफ की? आप एक इशारे से मेरा रोग ठीक कर सकते थे, फिर आपने
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