एक छोटे से घर में सरला जी अपनी बहू नेहा के साथ रहती थीं। नेहा नई-नई शादी करके आई थी—शांत, समझदार, लेकिन थोड़ी झिझक वाली। सरला जी थोड़ी सख्त स्वभाव की थीं, और घर के नियमों को लेकर बहुत पक्की। शुरू-शुरू में दोनों के बीच अक्सर छोटी-छोटी बातों पर तकरार हो जाती थी। “हमारे घर में ऐसा नहीं होता,” सरला जी कहतीं। नेहा चुपचाप सुन लेती, लेकिन अंदर ही अंदर उसे दुख होता। एक दिन नेहा की तबीयत बहुत खराब हो गई। बुखार से उसका शरीर तप रहा था, लेकिन फिर भी वह रसोई में काम करने लगी। तभी सरला जी ने देखा। “अरे, तू आराम क्यों नहीं कर रही?” उन्होंने थोड़ा गुस्से में कहा। नेहा धीरे से बोली, “माँ जी, अगर मैं काम नहीं करूंगी तो आपको परेशानी होगी…” यह सुनकर सरला जी कुछ पल के लिए चुप हो गईं। पहली बार उन्होंने नेहा की आँखों में डर नहीं, बल्कि अपनापन देखा। उन्होंने तुरंत उसका हाथ पकड़ा और कहा, “पगली, अब तू इस घर की बहू नहीं, बेटी है। चल, पहले दवाई ले और आराम कर।” उस दिन के बाद सब बदल गया। सरला जी ने नेहा को सिर्फ जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि प्यार से भी अपनाना शुरू किया। और नेहा ने भी सास में माँ को देखना शुरू कर दिया। घर वही था, लोग वही थे—लेकिन रिश्ते में प्यार आ गया था।
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