अनदेखी चीज़ें – एक छोटी सी कहानी सुबह 6 बजे का समय था। अलार्म बजने से पहले ही आँख खुल गई। बाहर हल्की रोशनी थी, लेकिन मन में वही रोज़ वाला बोझ — काम, जिम्मेदारियाँ, और भागदौड़। राहुल ने खिड़की खोली। सामने वाली सड़क पर चाय वाला पहले से ही जाग चुका था। कुछ लोग वहाँ खड़े थे — कोई अख़बार पढ़ रहा था, कोई मोबाइल में खोया हुआ था। सबकी ज़िंदगी अलग थी, पर सुबह सबकी एक जैसी थी। माँ रसोई में चुपचाप नाश्ता बना रही थीं। किसी ने उनसे “धन्यवाद” नहीं कहा, क्योंकि ये रोज़ का काम था… और शायद इसीलिए अनदेखा भी। ऑफिस जाते समय राहुल ने देखा — एक सफाई कर्मचारी सड़क साफ कर रहा था। लोग उसके पास से गुज़र रहे थे, जैसे वो दिखाई ही नहीं दे रहा हो। लेकिन अगर वो एक दिन ना आए, तो शायद सबको फर्क पड़े। बस में एक बुजुर्ग खड़े थे। कई लोग बैठे हुए थे, लेकिन सबने नज़रें फेर लीं। राहुल ने भी पहले अनदेखा किया… फिर अचानक उसे लगा — “हम रोज़ कितनी चीज़ें देखते हैं, पर ध्यान नहीं देते।” उसने अपनी सीट छोड़ दी। बुजुर्ग ने हल्की सी मुस्कान दी — छोटी सी बात थी, लेकिन दिल को सुकून मिला। ऑफिस में दिन भर काम चला — मीटिंग, टारगेट, तनाव। बीच-बीच में चाय आई, पानी आया… लेकिन कभी सोचा नहीं कि ये सब कौन कर रहा है। शाम को घर लौटते वक्त आसमान बहुत सुंदर था। सूरज ढल रहा था, हल्की हवा चल रही थी… लेकिन ज्यादातर लोग मोबाइल में ही व्यस्त थे। राहुल ने पहली बार रुककर आसमान को देखा। उसे एहसास हुआ — ज़िंदगी की सबसे जरूरी और खूबसूरत चीज़ें वही हैं, जिन्हें हम रोज़ देखते हैं… पर नोटिस नहीं करते।
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