12 जनवरी 1948, अहमदाबाद की Joint Civil Judge की court में एक हैरान कर देने वाला मुकदमा दाखिल होता है। इस मुक़दमे में दावा किया जाता है कि 'स्वामीनारायण संप्रदाय' हिंदू नहीं है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि यह दावा किसी और ने नहीं, बल्कि खुद स्वामीनारायण संप्रदाय के साधु और कुछ अनुयायियों ने किया था। लेकिन आखिर ऐसी क्या परिस्थितियाँ थीं, जिनके कारण अपने मंदिरों में भगवान कृष्ण को पूजने वाला यह संप्रदाय खुद को 'गैर-हिंदू' साबित करना चाहता था? इसका जवाब जानने के लिए हमें समय में थोड़ा पीछे जाना होगा। साल था 1799। गुजरात के काठियावाड़ में एक ब्रह्मचारी भ्रमण करता हुआ पहुँचा। वहाँ उसने रामानंद स्वामी नामक एक विशिष्टाद्वैतवादी संत से दीक्षा ली और ‘सहजानंद स्वामी’ के रूप में पहचाने जाने लगे। अगले तीस वर्षों में सहजानंद स्वामी ने अपने गुरु द्वारा स्थापित उद्धव संप्रदाय का गुजरात में व्यापक प्रचार किया और बड़ी संख्या में अनुयायी बनाए। आगे चलकर सहजानंद स्वामी ‘स्वामीनारायण’ के नाम से जाने गए और उनके संप्रदाय ने ‘स्वामीनारायण संप्रदाय’ के रूप में पहचान पाई। यह संप्रदाय हिंदू धर्म के वर्णाश्रम सिद्धांत का पालन करता था। इसमें छुआछूत के नियमों का पालन जाता था और शूद्रों को साधु की दीक्षा नहीं दी जाती थी। लेकिन समय बीता और साल आया 1947 का। आज़ादी के साथ ही Bombay Province में एक कानून पारित किया गया, जिसका नाम था ‘The Bombay Harijan Temple Entry Act’। इस कानून के Section 3 के तहत दलितों को, अन्य हिंदुओं की तरह, किसी भी हिंदू मंदिर में प्रवेश और आराधना करने से नहीं रोका जा सकता था। दलित संगठनों ने इस कानून का पुरजोर स्वागत किया और मंदिरों में प्रवेश के लिए एक बड़ी मुहिम छेड़ दी।
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