कहानी: “जिसे घर ने ठुकराया, वही सहारा बन गई” एक छोटे से गाँव में काव्या नाम की एक मेह

कहानी: “जिसे घर ने ठुकराया, वही सहारा बन गई” एक छोटे से गाँव में काव्या नाम की एक मेहनती और सीधी-सादी लड़की रहती थी। माँ के गुजर जाने के बाद उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। कुछ साल बाद पिता भी दुनिया से चले गए। अब काव्या अपने सौतेले भाई रोहित और उसकी पत्नी नेहा के साथ रहती थी। नेहा काव्या को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। वह दिनभर घर का काम करवाती और छोटी-छोटी बातों पर उसे ताने देती। एक दिन नेहा ने गुस्से में कहा, “तुम पूरे दिन घर में रहती हो और हमारे ऊपर बोझ बनी हुई हो। अब इस घर में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है!” काव्या ने रोहित की तरफ उम्मीद से देखा। लेकिन रोहित ने भी चुपचाप कहा, “काव्या... भाभी ठीक कह रही हैं। तुम कहीं जाकर अपना जीवन शुरू करो।” काव्या की आँखों में आँसू आ गए। उसने अपना छोटा-सा सामान उठाया और घर से बाहर निकल गई। शाम हो चुकी थी। काव्या गाँव की सड़क पर अकेली बैठी रो रही थी। तभी वहाँ से एक बुज़ुर्ग दादी माँ गुज़रीं। उन्होंने काव्या को देखा और प्यार से पूछा, “बेटी, इतनी रात को यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?” काव्या ने रोते हुए अपनी सारी कहानी दादी को बता दी। दादी ने उसका हाथ
0:00 / 0:00
Share
← Return to Studio