उस इमारत का सातवाँ मंज़िल हमेशा बंद रहता था

उस इमारत का सातवाँ मंज़िल हमेशा बंद रहता था। लेकिन उस रात लिफ्ट खुद वहीं रुक गई। अजय नई नौकरी के लिए एक पुराने मकान में रहने आया था। सब कुछ ठीक था, बस एक अजीब नियम था। सातवीं मंज़िल पर कभी मत जाना। अजय ने सोचा ये मज़ाक होगा। एक रात वह देर से घर आया और लिफ्ट में चढ़ गया। उसने पाँचवीं मंज़िल का बटन दबाया। लेकिन लिफ्ट अपने आप ऊपर जाने लगी। लिफ्ट रुक गई। सातवीं मंज़िल। दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। बाहर पूरा अंधेरा था। अजय डर गया लेकिन बाहर निकल गया। जैसे ही वह बाहर आया, लिफ्ट बंद हो गई। अब वह अकेला था। उसने देखा कि किसी भी दरवाज़े पर कोई नंबर नहीं था। जैसे यह जगह रहने के लिए बनी ही नहीं थी। अजय धीरे-धीरे आगे बढ़ा। दीवारों पर खून के निशान थे। दरवाज़ों पर खरोंच के निशान थे। तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई। अजय मुड़ा। कोई नहीं था। उसने एक दरवाज़े को छुआ। अंदर से ज़ोर से खटखटाने की आवाज़ आई। अजय डर गया। फिर सामने का दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर एक कमरा था और उसमें एक बड़ा आईना था। अजय आईने के पास गया। उसने उसमें देखा। वह अकेला नहीं था। उसके पीछे एक आदमी खड़ा था। जिसका चेहरा बिल्कुल अजय जैसा था। आईने के नीचे लिखा था। जो अंदर आया, वह कभी बाहर नहीं गया। अजय पीछे मुड़ा। लेकिन आईने में खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था। अचानक सब बदल गया। अजय आईने के अंदर था। और बाहर वही आदमी खड़ा था। उस दिन के बाद सातवीं मंज़िल फिर से बंद हो गई। लेकिन अब अंदर कौन है, यह कोई नहीं जानता।
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