दो मुस्लिम बहनें थीं — आयशा और मरियम। दोनों एक छोटे से घर में अपनी अम्मी के साथ रहती थीं। घर में ज़्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन दिल में सुकून और अल्लाह पर भरोसा बहुत था। आयशा हर वक़्त नमाज़ पढ़ती और कहती, “जो अल्लाह करता है, हमारे लिए बेहतर करता है।” लेकिन मरियम अक्सर परेशान रहती। वो सोचती — “हमारे पास दूसरों जैसा सब कुछ क्यों नहीं है?” एक दिन अम्मी बहुत बीमार हो गईं। घर में दवाई के पैसे भी नहीं थे। मरियम रोने लगी, लेकिन आयशा ने उसका हाथ पकड़कर कहा — “रो मत बहन… अल्लाह अपने बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।” उस रात दोनों बहनों ने मिलकर तहज्जुद में दुआ मांगी। सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई। पास के एक बुज़ुर्ग आदमी ने कहा — “कल तुम्हारी अम्मी ने मेरी बहुत मदद की थी… ये थोड़े पैसे रख लो।” मरियम की आंखों में आँसू आ गए। उसे समझ आ गया कि अल्लाह देर करता है
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