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## माँ का आखिरी इंतज़ार गाँव की उस पथरीली पगडंडी पर बैठी सरस्वती की आँखें धुंधला गई थीं, पर उम्मीद आज भी जवान थी। दस साल पहले उसका बेटा, समीर, शहर गया था—बड़ा आदमी बनने। शुरू में चिट्ठियाँ आती थीं, फिर सिर्फ पैसे, और पिछले तीन सालों से सन्नाटा था। गाँव वाले कहते, "वह तुम्हें भूल गया," पर सरस्वती मुस्कुरा देती। उसे विश्वास था कि उसका बेटा उसे लेने ज़रूर आएगा। बीमारी ने उसके शरीर को जकड़ लिया था, पर साँसें शायद समीर के इंतज़ार में ही रुकी थीं। एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, गाँव के बाहर एक महँगी गाड़ी रुकी। समीर उतरा, पर वह अकेला नहीं था। उसके चेहरे पर पश्चाताप के आँसू थे। जैसे ही वह घर के आँगन में पहुँचा, उसने देखा माँ अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी सामने के रास्ते को ताक रही थी। "माँ!" वह चिल्लाया और उसके चरणों में गिर पड़ा। सरस्वती के कांपते हाथों ने उसके सिर को छुआ। उसकी धुंधली आँखों में एक चमक आई, जैसे बरसों की प्यास बुझ गई हो। उसने बस इतना कहा, "देर कर दी बेटा, पर तू आ गया।" समीर की गोद में सिर रखे सरस्वती ने अपनी आखिरी सांस ली। उसका इंतज़ार खत्म हो चुका था, और चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जिसे देख कर लग रहा था कि उसने मौत को बस इसलिए रोक रखा था ताकि वह अपने लाल का चेहरा एक बार देख सके।
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