"आज इस ट्रेन में बैठा हूँ… और बाहर बदलते हुए नज़ारे देख रहा हूँ… अभी कुछ देर पहले… एक

"आज इस ट्रेन में बैठा हूँ… और बाहर बदलते हुए नज़ारे देख रहा हूँ… अभी कुछ देर पहले… एक दूसरी ट्रेन सामने से गुज़री… तेज़… शोर के साथ… जैसे ज़िंदगी में अचानक आने वाली परेशानियाँ… कुछ पल के लिए सब हिला देती हैं… और फिर… सब शांत हो जाता है… फिर ये पेड़… ये मकान… धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं… जैसे हमारे बीते हुए पल… कुछ अच्छे… कुछ अधूरे… पर सच बताऊँ… हम रोज़ ये सब देखते हैं… फिर भी समझ नहीं पाते… हम भी इसी ट्रेन की तरह भाग रहे हैं… बिना रुके… बिना सोचे… बस चलते जा रहे हैं… कभी टेंशन… कभी स्ट्रेस… कभी अंदर ही अंदर चल रहा शोर… और हम मान लेते हैं… कि सब अपने आप ठीक हो जाएगा… लेकिन हर सफर को… एक सही दिशा की ज़रूरत होती है… और कभी-कभी… खुद को समझने के लिए… किसी अपने की नज़र चाहिए होती है… जो रोके नहीं… बस रास्ता साफ़ कर दे… अगर आपको भी कभी लगे… कि आप चल तो रहे हैं… पर समझ नहीं पा रहे… तो याद रखिए… मैं हूँ… Dr Gajendraa Vyass… आपका दोस्त… आपका कोच… क्योंकि जब सोच साफ़ होती है… तो ज़िंदगी का हर सफर… खुद-ब-खुद आसान लगने लगता है…"

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“ये जो ट्रेन भाग रही है ना… इसे जल्दी नहीं है… फिर भी ये रुकती नहीं

“ये जो ट्रेन भाग रही है ना… इसे जल्दी नहीं है… फिर भी ये रुकती नहीं। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है… हम सोचते हैं कि हम कंट्रो

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