एक छोटा सा गाँव था… जहाँ एक लड़का रहता था – नाम था राहुल। उसके पास न बड़ा घर था, न पैसे… लेकिन एक सपना जरूर था — अपनी माँ को खुश देखना। राहुल की माँ बीमार रहती थी। दवाइयों के लिए पैसे नहीं थे… और हर रात माँ मुस्कुराकर कहती, “बेटा, मैं ठीक हूँ…” लेकिन राहुल जानता था — वो ठीक नहीं है। एक दिन उसने फैसला किया — “अब कुछ करना पड़ेगा।” उसे खाना बनाना थोड़ा आता था… तो उसने सोचा, “क्यों ना मैं momos बेचूँ?” लेकिन समस्या ये थी — ना ठेला था, ना पैसे। उसने अपने पुराने खिलौने बेचे, कुछ बर्तन गिरवी रखे… और जैसे-तैसे एक छोटा सा स्टॉल लगा लिया। पहला दिन… कोई ग्राहक नहीं आया। लोग पास से गुजरते… देखते… और आगे बढ़ जाते। राहुल की आँखों में आँसू थे… लेकिन उसने हार नहीं मानी। दूसरे दिन उसने और मेहनत की। Momos को और स्वादिष्ट बनाया… और दिल से आवाज लगाई — “गरमा-गरम momos… प्यार से बनाए हुए momos…” एक छोटा बच्चा आया… उसने एक प्लेट ली… खाया… और मुस्कुराया। वो मुस्कान राहुल के लिए उम्मीद बन गई। धीरे-धीरे लोग आने लगे… किसी ने taste की तारीफ की… किसी ने कहा, “इतने सस्ते और इतने tasty!” कुछ ही दिनों में उसका छोटा सा स्टॉल भीड़ से भरने लगा। राहुल हर प्लेट में सिर्फ momos नहीं… अपनी मेहनत और प्यार भी परोसता था। एक दिन… उसने पैसे गिने… और पहली बार उसके पास इतने पैसे थे कि वो माँ की दवाई खरीद सके। वो दौड़ता हुआ घर गया… माँ के हाथ में दवाई रखी… और बोला — “अब आप ठीक हो जाओगी माँ…” माँ की आँखों में आँसू थे… लेकिन इस बार वो खुशी के थे। समय बीतता गया… छोटा सा स्टॉल अब एक बड़ा दुकान बन चुका था। लोग दूर-दूर से आते… “राहुल के momos” खाने। लेकिन राहुल आज भी वही था… हर ग्राहक को मुस्कान के साथ momos देता… जैसे हर प्लेट
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