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**“रात 3 बजे वाला कमरा…”** “कहते हैं… रात के 3 बजे… दुनिया और कुछ और के बीच का दरवाज़ा खुलता है… और जो उस समय जाग रहा होता है… वो अकेला नहीं होता…” “ये कहानी है राहुल की… जो नई सिटी में पढ़ाई करने आया था… और उसने एक सस्ता कमरा किराए पर लिया…” “मकान मालिक ने बस एक ही बात कही… ‘बेटा… रात में 3 बजे… उस कमरे का दरवाज़ा मत खोलना…’” “राहुल हंसा… उसे लगा ये बस डराने के लिए कहा गया है…” “पहली रात… सब ठीक था… लेकिन दूसरी रात…” “ठीक 3 बजे… दरवाज़े पर… टक… टक… टक… की आवाज आई…” “राहुल ने सोचा… कोई मज़ाक कर रहा है… पर जैसे ही वो दरवाज़े के पास गया… आवाज़ अचानक बंद हो गई…” “तीसरी रात…” “इस बार… सिर्फ दरवाज़े पर नहीं… बल्कि उसके कमरे के अंदर… किसी के चलने की आवाज आने लगी…” “राहुल डर गया… उसने तुरंत लाइट ऑन की…” “लेकिन… कमरे में कोई नहीं था…” “फिर… धीरे-धीरे… उसने आईने की तरफ देखा…” “और वहाँ… आईने में… उसके पीछे… कोई खड़ा था…” “एक काली परछाई… जिसकी आँखें… सीधे उसे घूर रही थीं…” “राहुल ने डर के मारे पीछे मुड़कर देखा…” “लेकिन… वहाँ कोई नहीं था…” “फिर… उसने दोबारा आईने में देखा…” “वो परछाई… अब और करीब आ चुकी थी…” “उसकी मुस्कान… और भी डरावनी हो गई थी…” “और फिर… उसने धीरे से कहा…” “तुमने… दरवाज़ा क्यों खोला…?” “अगली सुबह… राहुल उस कमरे में नहीं मिला…” “कमरे की दीवार पर… बस एक लाइन लिखी थी…” “अब… दरवाज़ा कोई और खोलेगा…” “अगर तुम होते… तो दरवाज़ा खोलते… या नहीं…?”
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