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जब अरुण का परिवार पूजा के घर पहुंचता है, तो बातचीत के दौरान पुराने रिवाज के मुताबिक उससे गाना गाने के लिए कहा जाता है। लेकिन पूजा भजन की जगह सबके सामने एक इंग्लिश गाना गा देती है। यह देखकर कमलेश को अच्छा नहीं लगता और उसे महसूस होता है कि यह लड़की उनके घर के माहौल में फिट नहीं बैठेगी। वह पूजा के पहनावे पर भी सवाल उठाते हुए तंज कस देती है, जिससे साफ झलकता है कि वह उसे एक “आदर्श बहू” के रूप में नहीं देखती। हालांकि, अरुण को पूजा बहुत पसंद आ चुकी होती है। वह अपनी भाभी को मनाने के लिए लगातार कोशिश करता है और आखिरकार उसे मना ही लेता है। रिश्ता तय हो जाता है और जल्द ही सगाई की रस्म भी धूमधाम से पूरी होती है—पूजा की उंगली में अरुण के नाम की अंगूठी पहनाई जाती है। कुछ दिनों बाद, कमलेश अपनी सास के साथ ऑटो से कहीं जा रही होती है। रास्ते में उन्हें भारी ट्रैफिक जाम दिखता है। कारण जानने के लिए कमलेश बाहर निकलती है और देखती है कि सड़क पर लोग हाथों में पोस्टर लिए नारे लगा रहे हैं और रैली निकाल रहे हैं। जिज्ञासा में वह भी भीड़ के पास पहुंचती है और वहां खड़ी एक लड़की, सोना, से पूछती है कि यह किस बात की रैली है। सोना बताती है कि यह एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के समर्थन में निकाला गया जुलूस है—उन लोगों के लिए, जिनकी पहचान और पसंद समाज के पारंपरिक ढांचे से अलग होती है।
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