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नेहा की आँखें भर आईं। वह धीरे से उठकर आरव के सामने आकर खड़ी हो गई। “मैंने सच में तुम्हें चोट पहुँचाई है।” उसकी आवाज काँप रही थी। “लेकिन मैं हर दिन खुद को बदलने की कोशिश कर रही हूँ।” “मैं अब वही नेहा नहीं हूँ।” कमरे में खामोशी फैल गई। आरव ने पहली बार उसकी तरफ ध्यान से देखा। उसे याद आया— वही नेहा जो कभी बहुत हँसती थी आज चुप खड़ी थी। उसकी आँखों में सिर्फ पछतावा था। तभी आरव की माँ ने धीरे से कहा— “बेटा… सम्मान बहुत जरूरी होता है।” “लेकिन अगर कोई सच में बदल जाए तो उसे एक मौका देना भी बड़ा दिल होता है।” कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर आरव धीरे-धीरे नेहा के पास आया। उसने शांत आवाज में कहा— “तुम्हें पता है… उस रात सबसे ज्यादा क्या चुभा था?” नेहा ने सिर झुका लिया।
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