वीरान गोदाम में बहती तेज़ हवा किसी मातम के गीत जैसी लग रही थी, जो साइलस के जीवन के लिए एकदम सटीक थी। पैंतीस साल की उम्र में, साइलस अपने ही शहर में एक भूत की तरह था। वह एक जंग लगी कुर्सी पर बैठा कंक्रीट के फर्श को घूर रहा था, उसके हाथ कांप रहे थे—ठंड से नहीं, बल्कि असफलता के भारी बोझ से। एक बुरी तरह नाकाम हुए जुए में उसने अपना करियर, अपनी सारी जमा पूंजी और अपना परिवार सब कुछ खो दिया था।अंधकार केवल उसे घेरे हुए नहीं था; वह उसके भीतर समाया हुआ था, एक ठंडी, भारी चादर की तरह जिसने सांस लेना भी एक सचेत प्रयास बना दिया था। उसने अंत में मृत्यु के बारे में सोचा था। बर्बाद जीवन का यही एकमात्र तार्किक अंत प्रतीत होता था।अचानक, एक चूहा उसके पैर पर से सरपट भागा। साइलस चौंक गया, उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था। उसने ऊपर देखा, उसकी नज़र एक टूटे तार से लटकते एक बल्ब की रोशनी पर पड़ी। उसने रोशनी को हिलते हुए देखा—आगे-पीछे, आगे-पीछे।यह टूट जाने मात्र से चलना बंद नहीं कर देता, एक विचार कौंधा, जो अंधकार में मुश्किल से सुनाई दे रहा था।साइलस को अपने दादाजी याद आए, जो खानों में तब तक काम करते रहे जब तक धूल से उनके फेफड़े खराब नहीं हो गए। बूढ़े दादाजी हमेशा कहते थे, "अंधेरा तो बस प्रकाश की अनुपस्थिति है, बेटा। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रकाश अब मौजूद नहीं है।"वह खड़ा हुआ, उसके घुटने कांप रहे थे। उसे कोई प्रेरणा नहीं मिल रही थी। वह बहुत बुरा महसूस कर रहा था। वह बोझिल महसूस कर रहा था। लेकिन उसके अंदर शुद्ध, बेमिसाल क्रोध की एक चिंगारी भी भड़क उठी—दुनिया पर क्रोध, अपने फैसलों पर क्रोध, और उस अंधकार पर क्रोध जिसने खुद को विजयी समझा था।"आज नहीं," उसने फुसफुसाते हुए कहा, सन्नाटे में उसक
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