एक समय की बात है। एक बड़े और न्यायप्रिय राजा के दरबार में दूर-दूर से लोग अपनी कला और बुद्धिमानी दिखाने आते थे। एक दिन एक वृद्ध कारीगर दरबार में आया। उसके हाथ में एक सुंदर डिब्बा था। उसने राजा को प्रणाम किया और कहा, “महाराज, मैं आपके लिए तीन खास गुड़ियाएँ लाया हूँ। देखने में ये तीनों बिल्कुल एक जैसी हैं, लेकिन इनका मूल्य अलग-अलग है।” राजा हैरान हुए। उन्होंने तीनों गुड़ियाएँ ध्यान से देखीं। सचमुच, तीनों एक जैसी थीं — वही आकार, वही रंग, वही मुस्कान। राजा ने अपने मंत्रियों और विद्वानों से पूछा, “बताइए, इनमें अंतर क्या है?” सबने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई उत्तर नहीं दे पाया। तब वृद्ध कारीगर मुस्कुराया और बोला, “महाराज, अनुमति हो तो मैं रहस्य बताऊँ?” राजा ने कहा, “ज़रूर।” कारीगर ने एक पतली सोने की सुई निकाली और पहली गुड़िया के कान में डाली। सुई दूसरे कान से बाहर निकल गई। कारीगर बोला, “यह उस व्यक्ति की तरह है जो एक कान से सुनता है और दूसरे कान से निकाल देता है। ऐसी बातों का कोई मूल्य नहीं।” फिर उसने दूसरी गुड़िया के कान में सुई डाली। इस बार सुई उसके मुँह से बाहर आई। कारीगर बोला, “यह उस व्यक्ति जैसी है जो जो भी सुनता है, तुरंत दूसरों को बता देता है। ऐसे व्यक्ति पर भरोसा नहीं किया जा सकता।” अब उसने तीसरी गुड़िया उठाई। सुई कान में गई, लेकिन बाहर नहीं निकली। कारीगर बोला, “यह सबसे मूल्यवान है। यह उस बुद्धिमान व्यक्ति जैसी है जो अच्छी बातें सुनकर उन्हें अपने भीतर संभाल कर रखता है और सही समय पर उनका उपयोग करता है।” राजा बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कारीगर को सम्मान और इनाम दिया।
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