रेगिस्तान के बीचों-बीच कई दिनों से भटक रही इस औरत को अब बस एक ही चीज़ चाहिए थी

रेगिस्तान के बीचों-बीच कई दिनों से भटक रही इस औरत को अब बस एक ही चीज़ चाहिए थी... पानी। उसका गला सूख चुका था, आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था, और हर कदम उसके लिए मौत के बराबर था। लेकिन तभी... उसे रेत पर एक चमकता हुआ गड्ढा दिखाई दिया। औरत की सूखी आंखों में उम्मीद लौट आई। वह पागलों की तरह दौड़ी, अपने कप में उस तरल को भरा और जैसे ही पीने लगी— वह अचानक जम गई। क्योंकि ये पानी नहीं था... वो किसी अनजान दैत्य का छोड़ा हुआ गाढ़ा, लिसलिसा ज़हर था। अगर एक बूंद भी उसके अंदर चली जाती... तो शायद अगले ही पल वह इंसान नहीं रहती। और तभी पीछे से एक अजीब सी घोड़े जैसी चीख सुनाई दी। औरत ने पलटकर देखा... और जो सामने खड़ा था, उसे देखकर उसकी सांसें रुक गईं। एक चमकदार सफेद यूनिकॉर्न। रेगिस्तान के बीच... एक यूनिकॉर्न? वह बार-बार सिर उठाकर जैसे उसे चेतावनी दे रहा था— "यहां रुकना मौत है... मेरे पीछे आओ।" औरत समझ चुकी थी कि अभी-अभी किसी अनदेखी ताकत ने उसकी जान बचाई है। वह उसे छूकर धन्यवाद कहना चाहती थी, लेकिन यूनिकॉर्न पलटा और रेत में दौड़ पड़ा। जैसे उसे किसी ऐसी जगह ले जा रहा हो... जहां शायद जिंदगी उसका इंतजार कर रही थी। कई दिनों से मौत से जूझ रही औरत बिना सोचे उसके पीछे चल पड़ी। कुछ दूर जाने के बाद वे एक छोटे से दलदली हिस्से के पास पहुँचे। तभी औरत की नजर एक अजीब चार पैरों वाले सांप पर पड़ी। भूख अब उसके दिमाग पर हावी हो चुकी थी। वह उसे पकड़ने के लिए झपटी। लेकिन जैसे ही उसने पत्थर हटाया... उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां किसी रहस्यमयी जीव के बड़े-बड़े अंडे रखे थे। उस वक्त उसके लिए ये अंडे किसी खजाने से कम नहीं थे। वह उन्हें तुरंत उठाकर खा गई। कई दिनों बाद उसके शरीर में थोड़ी ताकत लौटी... और थकान से

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