एक महिला ट्रेन में सफर कर रही थी

एक महिला ट्रेन में सफर कर रही थी। उसके हाथ में एक छोटा सा आलू था। अचानक उसने आलू को खिड़की से बाहर रेगिस्तान में फेंक दिया। आलू सूखी और फटी हुई जमीन पर गिर पड़ा। चारों तरफ सिर्फ रेत और तेज धूप थी। ऐसा लग रहा था जैसे वहां कभी कुछ उग ही नहीं सकता। रात हुई तो आसमान में काले बादल छा गए। धीरे-धीरे बारिश शुरू हुई। बारिश की कुछ बूंदें उस आलू पर गिरीं और उसे थोड़ी नमी मिल गई। कई दिनों बाद उसी आलू से एक छोटा सा हरा पौधा निकल आया। सूखे रेगिस्तान में वह पौधा उम्मीद की तरह चमक रहा था। लेकिन रेगिस्तान की तेज धूप के कारण पौधा फिर से सूखने लगा। तभी वहां एक दयालु दरियाई घोड़ा आया। उसने पौधे को देखा और उसे बचाने का फैसला किया। वह रोज दूर से थोड़ा-थोड़ा पानी लाकर पौधे में डालने लगा। उसकी मेहनत और प्यार से पौधा धीरे-धीरे हरा और मजबूत होने लगा। कुछ महीनों बाद वही छोटा पौधा एक बड़ा और सुंदर आलू का पौधा बन गया। उसकी बड़ी-बड़ी पत्तियों के नीचे ठंडी छांव बन गई। दरियाई घोड़ा अपनी दोस्त के साथ उस पौधे के नीचे बैठता, खेलता और सोचता कि अब यही उनका नया घर होगा। दोनों बहुत खुश थे। लेकिन एक दिन अचानक वही महिला फिर वहां आई। उसने बड़े पौधे को जड़ से उखाड़ दिया और सारे आलू लेकर चली गई। पौधा टूटकर जमीन पर गिर गया। दोनों दरियाई घोड़े उदास होकर टूटे हुए पौधे को देखते रहे। उनकी आंखों में आंसू थे, क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक पौधा नहीं बल्कि अपना सपना खो दिया था।
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