तभी ब्रह्मा जी देवी की स्तुति करते हैं… और देवी प्रकट होकर विष्णु को जगाती हैं। मतलब साफ है… देवी जागरण है। देवी चेतना है। फिर आता है दूसरा चरित्र… महिषासुर वध। महिषासुर… भैंसे जैसा जिद्दी अहंकार है। जो न सुनता है… न समझता है… बस अपनी जिद पर चलता है। देवता हार जाते हैं। और तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव के तेज से… एक दिव्य शक्ति प्रकट होती है… माँ दुर्गा। हर देवता अपना अस्त्र देता है… शिव त्रिशूल देते हैं, विष्णु चक्र, इंद्र वज्र… और हिमालय सिंह देते हैं। नौ दिन युद्ध चलता है… महिषासुर रूप बदलता रहता है… कभी भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी, कभी मनुष्य… लेकिन अंत में… देवी उसके अहंकार का वध कर देती हैं। और यही है नवरात्रि का असली अर्थ… अपने भीतर की जड़ता और जिद को खत्म करना। अब आती है तीसरी कहानी… सबसे लंबी और सबसे गहरी।
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