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Welcome to my channel story Aaj hum sunenge “काली रात का साया” (Part 2) अर्जुन की आँखें धीरे-धीरे खुलीं… वो ज़मीन पर पड़ा था। कमरा वही था… लेकिन सब कुछ बदला हुआ लग रहा था। हवा भारी… और दीवारों से सड़ांध की बदबू आ रही थी। उसे याद आया—उसने अपने ही जैसे किसी को देखा था… अचानक… उसके पीछे से आवाज आई— “डर गया?” अर्जुन तुरंत पलटा। वो… वही था। उसकी ही शक्ल… लेकिन इस बार और भी डरावनी। आँखें पूरी काली… और मुँह अजीब तरीके से फटा हुआ। “मैं तेरा साया नहीं हूँ… मैं वही हूँ जो हर शनिवार–रविवार को जीता है…” अर्जुन पीछे हटने लगा— “तू क्या है…?” वो हँसने लगा—धीमी, टूटी हुई आवाज में— “ये घर… ये गाँव… सब मेरा है। जो यहाँ आता है… उसका चेहरा मैं ले लेता हूँ…” अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं। जैसे घर ज़िंदा हो… फर्श पर काले-काले हाथ निकलने लगे… जो अर्जुन के पैरों को पकड़ने लगे। अर्जुन चिल्लाया और खुद को छुड़ाकर भागा। सीढ़ियों से नीचे उतरते वक्त… उसे लगा कोई उसके पीछे दौड़ रहा है। ठक… ठक… ठक… इस बार आवाज बहुत तेज थी! वो नीचे पहुँचा… दरवाज़ा खोला… और बाहर भाग गया। लेकिन बाहर का गाँव… वो गाँव नहीं था। हर घर टूटा हुआ… पेड़ों पर काले कपड़े लटके हुए… और चारों तरफ धुआँ… जैसे सालों पहले सब जल चुका हो। अर्जुन समझ गया— वो किसी और दुनिया में आ चुका है। तभी… उसके सामने 5–6 लोग खड़े दिखे… सबके चेहरे… अजीब थे… कोई बिना आँखों के… कोई आधा जला हुआ… कोई सिर्फ मुस्कुरा रहा था। एक बूढ़ी औरत आगे आई— “तू भी फँस गया…?” अर्जुन घबराकर बोला—“ये क्या जगह है…?” वो धीरे से बोली— “ये ‘उसका’ इलाका है… जो शनिवार और रविवार को जागता है… और हम सब… उसके शिकार हैं…” अर्जुन का दिल डूब गया— “क्या… मैं यहाँ से निकल सकता हूँ?
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