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हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा गाँव था—काफ़ी हद तक दुनिया से कटा हुआ। वहाँ मोबाइल नेटवर्क मुश्किल से आता था और शाम होते ही पूरा इलाका अजीब सी खामोशी में डूब जाता था। उस गाँव में नया-नया आया था कबीर। कबीर शहर का लड़का था, लेकिन उसे अकेलापन और पहाड़ दोनों पसंद थे। वो एक लेखक था और अपनी नई किताब के लिए शांति ढूंढ रहा था। गाँव में उसे एक पुराना लकड़ी का घर किराए पर मिल गया—पहाड़ के किनारे, जहाँ से नीचे गहरी खाई दिखती थी। गाँव वालों ने उसे एक अजीब सी चेतावनी दी थी— “बारिश के बाद पहाड़ों में ज़्यादा मत घूमना… खासकर उस पुराने रास्ते पर।” कबीर ने हँसकर बात टाल दी। उसे लगा, ये बस गाँव की पुरानी कहानियाँ हैं। पहला हफ्ता शांत बीता। फिर एक रात… बारिश शुरू हुई। धीमी-धीमी बूंदों से शुरू होकर, कुछ ही देर में मूसलाधार बारिश में बदल गई। बिजली कड़क रही थी, हवा खिड़कियों को जोर-जोर से हिला रही थी। कबीर अपने कमरे में बैठा लिख रहा था… तभी उसे बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई। टक… टक… टक… जैसे कोई कीचड़ भरे रास्ते पर धीरे-धीरे चल रहा हो। उसने खिड़की से झाँका— लेकिन बाहर सिर्फ अंधेरा था… और बारिश। उसने सोचा शायद उसका भ्रम है। अगले दिन सुबह, जब बारिश रुक चुकी थी, कबीर बाहर निकला। मिट्टी गीली थी… और घर के बाहर साफ़ पैरों के निशान थे। नंगे पैर के। और वो निशान… सीधे उसी पुराने रास्ते की तरफ जा रहे थे, जिसके बारे में गाँव वालों ने चेतावनी दी थी। अब कबीर की उत्सुकता बढ़ चुकी थी। शाम होते-होते आसमान फिर से काला होने लगा। इस बार उसने तय किया—वो उस रास्ते पर जाएगा। बारिश फिर शुरू हो गई। कबीर टॉर्च लेकर निकल पड़ा। रास्ता फिसलन भरा था, पेड़ों के बीच अजीब सी सरसराहट हो रही थी। जैसे कोई छुपकर उसे देख रहा हो
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