एक भक्त की परीक्षा उसी समय पृथ्वी पर एक परम शिव भक्त राजा थे राजा कामरूपेश्वर... वे भगवान शिव की भक्ति में हमेशा लीन रहते थे। भीम ने जब देखा कि यह राजा केवल शिव की पूजा करता है तो उसने उसे बंदी बना लिया और कहा: “अब से केवल मेरी पूजा करो!” लेकिन राजा कामरूपेश्वर ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा... “मैं केवल भगवान शिव का भक्त हूँ, किसी राक्षस का नहीं।” यह सुनकर भीम क्रोधित हो गया… और उसने राजा को मारने का फैसला किया। जैसे ही भीम राजा को मारने के लिए आगे बढ़ा… उसी समय वहां एक दिव्य प्रकाश हुआ… और प्रकट हुए स्वयं भगवान शिव... शिव जी ने भीम को चेतावनी दी – “अत्याचार का अंत अब निश्चित है!” इसके बाद भगवान शिव और राक्षस भीम के बीच भयंकर युद्ध शुरू हुआ… धरती कांप उठी, आकाश गूंजने लगा… भीम अपनी पूरी शक्ति से लड़ रहा था लेकिन शिव जी के सामने उसकी एक न चली… अंत में भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से भीम का वध कर दिया। जैसे ही भीम मारा गया, सभी देवताओं ने राहत की सांस ली… और राजा कामरूपेश्वर भी मुक्त हो गए। “भीमाशंकर” नाम कैसे पड़ा? युद्ध के बाद भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ… लेकिन इस भयंकर युद्ध के कारण उनके शरीर से बहुत पसीना निकला… वह पसीना एक धारा बनकर बहने लगा और एक पवित्र नदी का रूप ले लिया। इस स्थान पर भगवान शिव “भीम के संहारक” के रूप में स्थापित हुए… इसलिए उनका नाम पड़ा भीम + शंकर = भीमाशंकर पवित्र ज्योतिर्लिंग यह वही स्थान है जहां आज प्रसिद्ध भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग स्थित है। यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है… जहां आज भी लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं। इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? अहंकार का अंत निश्चित है सच्ची भक्ति में बहुत शक्ति होती है भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें चैनल को सब्सक्राइब करें और ऐसी ही और पौराणिक कहानियों के लिए जुड़े रहें…
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Created: 2026-04-02T06:50:32.805Z